ज़ोहरा सहगल की ओर फेंका पांसा, जब नेहरू जी को पड़ा भारी!

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जानी मानी अभिनेत्री ज़ोहरा सहगल (अब दिवंगत) ने अपनी आत्मकथा ‘क़रीब से’ में एक दिलचस्प किस्सा बयान किया है जो जवाहर लाल नेहरू की सांस्कृतिक संस्थाओं के कामकाज में गंभीर रुचि की एक झलक देता है।

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गणतंत्र दिवस पर होने वाले लोकनृत्यों को छाँटने और करवाने के लिए बनी समिति की कमान उन दिनों इंदिरा गांधी के हाथों में थी। ज़ोहरा सहगल को आज़ादी के बाद दिल्ली प्रवास के दौरान रक्षा मंत्रालय ने इस काम में मदद के लिए मौक़ा दिया क्योंकि उनके पास नृत्य और रंगमंच का अनुभव था। इंदिरा गांधी जब भी दिल्ली में होती थीं, प्रधानमंत्री आवास में अपने पिता जवाहर लाल नेहरू के पास ही ठहरती थीं।

ज़ोहरा सहगल लिखती हैं- एक बार जब मैं इन लोकनर्तकों की टोलियों को ईनाम देने के लिए प्रधानमंत्री के घर पर हो रहे कार्यक्रम को देखने पहुँची तो मेरे हाथ में जीतने वालों की एक सूची थमा दी गई और मुझे माइक के आगे खड़ा कर दिया गया। लगता था कि संगीत नाटक अकादमी ने आकाशवाणी के जिस एनाउंसर को बुलाया था, वह पहुँच नहीं पाया था इसलिए और कोई रास्ता न पाकर उन्होंने यह ज़िम्मेदारी मुझे सौंप दी थी। बहरहाल, अपनी घबराहट को जितना मुमकिन था छिपाते हुए मैंने ऊँची और साफ़ आवाज़ में अंग्रेज़ी में बनावटी लहजे में पढ़ना शुरू किया,”गणतंत्र दिवस डाँस फ़ेस्टिवल का पहला ईनाम मिलता है बिहार से आई टोली को।” पंडित जी ग़ुस्से से आगबबूला हो गए। टोली में आगे खड़ी एक हँसती हुई देहाती लड़की को उन्होंने मेरे आगे किया – क्या संगीत नाटक अकादमी का कामकाज अब भी अंग्रेज़ी में होता है? तुम कैसे सोच सकती हो कि यह बच्ची तुम्हारी अंग्रेज़ी में कहीं बात समझ पाएगी?” उन्होंने ग़ुस्से भरी आवाज़ में फुसफुसाते हुए हिंदी में मुझसे कहा। सूची में अगले ईनाम ‘रनर्स अप’ यानी दूसरे-तीसरे स्थान पर आई टीमों के लिए थे। मैं किसी भी हालत में उसके लिए हिंदी में कोई सही शब्द सोच ही नहीं सकती थी।

इसके आगे जो हुआ वह बहुत मज़ेदार था जिसका ज़िक्र करते हुए ज़ोहरा सहगल लिखती हैं- यह शायद मेरे करियर का सबसे शर्मिंदगी भरा लम्हा था, लेकिन क़िस्मत से मुझमें इतनी हिम्मत थी कि मैंने ख़ुद पंडित जी से ही पूछ लिया,” रनर्स अप के लिए हिंदी में क्या कहा जाएगा? ” अब अटकने की बारी उनकी थी। ” रनर्स अप? रनर्स अप?” बरामदे में ऊपर से नीचे चहलक़दमी करते हुए वह शब्द दोहराते हुए सोच रहे थे, उनके दोनों हाथ पीठ के पीछे मुड़े थे, एक हाथ की उँगलियाँ दूसरी हथेली पर ताल दे रही थीं। ” फ़िलहाल इसके लिए रनर्स अप ही इस्तेमाल करो लेकिन बाक़ी घोषणा हिंदी में करना।” उन्होंने सोच कर कहा।

यह नेहरू से जुड़े उन हज़ारों क़िस्सों में से है जो उनके उदार, लोकतांत्रिक और बौद्धिक मिज़ाज की झलक देते हैं। तब आप प्रधानमंत्री से सीधे तौर पर सवाल कर सकते थे और सवाल पूछने वाले को उनकी नाराज़गी का ख़तरा नहीं होता था। अब प्रधानमंत्री सिर्फ़ अपने मन की बात करते हैं, जनता के मन की बात नहीं सुनते। नेहरू को खलनायक बनाने की कोशिशों के पीछे देश की उदार, लोकतांत्रिक , धर्मनिरपेक्ष चेतना को निरंतर हतोत्साहित करने का एक सुनियोजित प्रयास चल रहा है।

Amitaabh Srivastava, Former Executive editor at TV TODAY NETWORK LTD की कलम से। – Facebook Profile