कार्टूनिस्‍ट से फिल्‍मकार बने बासु चटर्जी छोड़ गए ‘सारा आकाश’

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कार्टूनिस्‍ट से फिल्‍म निर्देशक बने बासु चटर्जी ने गुरूवार को मुम्‍बई में अंतिम सांस ली। 90 वर्षीय फिल्‍म निर्देशक बासु चटर्जी लंबे समय से कई सेहत समस्‍याओं से जूझ रहे थे। गुरूवार को बाद दोपहर सांता क्रूज़ श्मशान में फिल्‍म निर्देशक बासु चटर्जी का दाह संस्‍कार किया गया।

गौरतलब है कि बासु चटर्जी ने राजेंद्र यादव के लिखे उपन्‍यास ‘सारा आकाश’ के कुछ हिस्‍से को आधार बनाकर फिल्‍म ‘सारा आकाश’ से 1969 में बतौर फिल्‍म निर्देशक पारी शुरू की। लेकिन, बासु चटर्जी की पहली सफल फिल्‍म रजनीगंधा थी, जिसमें अमोल पालेकर और विद्या सिन्‍हा मुख्‍य भूमिका में नजर आए थे।

बासु चटर्जी का जन्‍म 10 जनवरी 1930 को अजमेर शहर में हुआ। उनकी पढ़ाई लिखाई मथुरा शहर में हुई। पढ़ाई खत्‍म करने के बाद बासु चटर्जी ने मुम्‍बई का रुख किया, जहां उन्‍होंने एक सैन्‍य स्‍कूल में लाइब्रेरियन के तौर पर जॉब शुरू की। इसके बाद बासु चटर्जी ने ब्लिट्ज नामक मैग्‍जीन में बतौर कार्टूनिस्‍ट काम करना शुरू किया।

किशोर अवस्‍था से ही फिल्‍म देखने के शौकीन रहे बासु चटर्जी फिल्‍म सोसायटी मूवमेंट के साथ जुड़े और धीरे धीरे फिल्‍म जगत में कुछ करने की इच्‍छा बढ़ने लगी।

गीतकार शैलेंद्र, जो बासु चटर्जी के अच्‍छे दोस्‍त थे, की बदौलत बासु चटर्जी को तीसरी कसम में बतौर सहायक निर्देशक काम करने का मौका मिला। तीसरी कसम करने के बाद गोविन्द सरैया की फिल्‍म सरस्‍वती चंद्र में भी बतौर सहायक निर्देशक काम किया।

बतौर सहायक निर्देशक तीसरी कसम और सरस्‍वती चंद्र करने के बाद बासु चटर्जी ने फिल्‍म फिनांस कार्पोरेशन से लोन लेकर ‘सारा आकाश’ बनाने की ठानी, जो बतौर निर्देशक उनकी पहली फिल्‍म थी। इस फिल्‍म की शूटिंग आगरा में उपन्‍यास लेखक राजेंद्र यादव के घर पर ही हुई।

लगभग 42 हिन्‍दी फिल्‍मों का निर्देशन करने वाले बासु चटर्जी ने अपनी पहली फिल्‍म सारा आकाश को हमेशा ही अपनी बेहतरीन फिल्‍म बताया। भले ही यह फिल्‍म बॉक्‍स ऑफिस पर औंधे मुंह गिरी थी। इस फिल्‍म को बनाने के लिए लगभग ढ़ाई लाख रुपये खर्च हुए थे,‍ जिसमें दो लाख रुपये का सरकारी लोन भी शामिल था। फिल्‍म सारा आकाश की असफलता के कारण सिर चढ़ा कर्ज बासु चटर्जी ने अन्‍य फिल्‍मों से हुई कमाई द्वारा चुकाया।

बासु चटर्जी एक ऐसे फिल्‍म निर्देशक थे, जो पर्दे पर मध्‍यवर्गीय परिवारों की कहानी को अलग तरीके से कहने का दम भरते थे। उनकी फिल्‍मों में मारधाड़ नहीं होती थी, बल्कि उनकी फिल्‍मों में मध्यवर्गीय परिवारों के वैवाहिक और प्रेम संबंधों का जिक्र होता था।

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