Movie Review : सनी देओल और करण कपाड़िया की ब्लैंक

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हिंदी सिने जगत में आतंकवाद के इर्दगिर्द बनने वाली फिल्मों की एक लंबी फेहरिस्त है। अब, इस फेहरिस्त में एक और नया नाम जुड़ चुका है, जो सनी देओल और करण कपाडिया अभिनीत फिल्म ब्लैंक का।

बहजाद खम्बाता के निर्देशन में बनी ब्लैंक आंवले की तरह देर से स्वाद देती है। बहजाद खम्बाता की ब्लैंक मुस्लिम आतंकवाद को एक अलग नजरिये से दिखाने की कोशिश करती है। क्राइम सस्पेंस थ्रिलर ब्लैंक शुरू से अंत तक सस्पेंस बनाकर रखती है। किंतु, इसका स्क्रीन प्ले रोमांच को निरंतर बनाए रखने में असफल रहता है।

फिल्म की कहानी हनीफ करण कपाडिया नामक मुस्लिम युवक और एटीएस चीफ दीवान सनी देअेाल के इर्दगिर्द घूमती है। हनीफ की छाती पर एक बम्ब लगा हुआ है, जो उसकी धड़कन के रूकते ही फट जाएगा और अन्य 24 बम्बों को एक्टिव कर देगा। देखते ही देखते पूरा शहर धूंएं की चादर में लिपट जाएगा।

फिल्म की शुरूआत एक रेगिस्तान से होती है, जहां पर युवा आतंकवादी हनीफ को गोली से उड़ाने की तैयारी चल रही है। किंतू, यहां से ब्लैंक की कहानी कुछ घंटे पीछे चली जाती है। जहां पर हनीफ का एक्सीडेंट होता है। हनीफ अपनी याददाश्त खो देता है और अंत हनीफ एटीएस के हत्थे चढ़ता है।

कहानी फिर से एनकाउंटर वाले सीन पर लौटती है। लेकिन हनीफ का एनकाउंटर होने से पहले ही घटनास्थल पर आतंकवादियों का एक दस्ता पहुंच जाता है और हनीफ को गोलीबारी के बीच बचाकर ले जाता है।

क्या हनीफ अपने मकसद में कामयाब हो पाएगा? क्या एटीएस दीवान की टीम शहर में होने वाले 25 बम्ब धमाकों को रोक लेगी? ऐसे तमाम सवालों के जवाब तो फिल्म ब्लैंक देखने पर ही मिलेंगे।

सनी देओल को उम्र के हिसाब से बेहतरीन किरदार मिला और उन्होंने इस किरदार को गंभीरता के साथ निभाया। हालांकि, इस किरदार को और सशक्त बनाने की जरूरत लगती है। नवोदित अभिनेता करण कपाडिया ने आतंकवादी के किरदार को बड़ी गंभीरता के साथ अदा किया है। एक्शन सीनों में करण कपाडिया का जोश और स्टेमिना देखने लायक है।

अन्य कलाकारों का काम अच्छा था। आतंकवादी सरगना जमील खान भी अंतिम सीनों में प्रभावित करते हैं। एक्शन सीनों में इशिता दत्ता और करण कपाडिया जबरदस्त लगते हैं। सनी देओल का किरदार अंतिम पलों में खुलकर सामने आता है। फिल्म के अंतिम कुछ मिनट काफी चुस्ती भरे हैं, जो दर्शकों को जोश से भरते हैं।

फिल्म निर्देशक बहजाद खम्बाता ने करण कपाड़िया का डेब्यु प्रभावित न हो, शायद इस बात को सोचते हुए अन्य कलाकारों के किरदारों को अधिक सशक्त बनाने की तकलीफ नहीं की। पटकथा का ढीलापन सस्पेंस थ्रिलर में स्पीड ब्रेक का काम करता है। कुछ खामियों के बावजूद भी ब्लैंक एक बार तो देखे जाने लायक फिल्म है।

खूबसूरत बातों में फिल्म ब्लैंक का क्लाईमैक्स जबरदस्त है। फिल्म का अंत आतंकवाद को समझने के लिए एक नया नजरिया देता है। फिल्म के अंतिम संवाद और सीन काफी दमदार हैं। एक्शन सीनों पर जबरदस्त काम किया गया है।

चलते चलते : एक्शन फिल्म दीवानों के लिए बहुत कुछ है, किंतु, रोमांस फिल्म प्रेमियों के लिए कुछ नहीं है।

कुलवंत हैप्पी